आजकल इंडिया न्यूज के पत्रकार अनीश खान की मेहनत लाई रंग
14 साल से पीड़ा झेल रही साजिया को मिला प्रशासन का संज्ञान*

*आजकल इंडिया न्यूज के पत्रकार अनीश खान की मेहनत लाई रंग: 14 साल से पीड़ा झेल रही साजिया को मिला प्रशासन का संज्ञान*




*आगरा।*
कहते हैं सच्ची पत्रकारिता आज भी ज़िंदा है—और इसका उदाहरण बने अनीश खान, जिनकी संवेदनशील रिपोर्टिंग ने 14 साल से दर्द झेल रही एक मासूम बच्ची की जिंदगी में उम्मीद की किरण जगा दी।
नरीपुरा स्थित भीमनगर बाड़े वाली गली में रहने वाली 14 वर्षीय साजिया अब्बासी की दर्दनाक कहानी जब आजकल इंडिया न्यूज के पत्रकार अनीश खान तक पहुंची, तो उन्होंने इसे सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदारी समझा। साजिया की हालत, उसकी मां की बेबसी और वर्षों से चला आ रहा दर्द—हर पहलू को उन्होंने पूरी संवेदनशीलता के साथ कैमरे के सामने रखा।
ढाई माह की उम्र में चूहों द्वारा पैरों की सभी अंगुलियां कुतर लिए जाने की यह घटना मानवता को झकझोर देने वाली है। जन्म से ही साजिया का कमर से नीचे का शरीर सुन्न है, जिस कारण वह उस वक्त दर्द भी महसूस नहीं कर सकी थी। लेकिन आज, 14 साल बाद भी संक्रमण, सूजन और असहनीय पीड़ा उसका पीछा नहीं छोड़ रही।
*पत्रकारिता बनी सहारा*
अनीश खान ने इस मामले को प्रमुखता से आजकल इंडिया न्यूज पर प्रसारित किया। खबर सामने आते ही न सिर्फ समाज का ध्यान गया, बल्कि प्रशासन भी हरकत में आया। यही वह पल था, जब एक पत्रकार की मेहनत रंग लाई।
खबर के प्रसारण के बाद बेबस मां मिसिया ने जिलाधिकारी अरविंद बंगारी से बेटी के इलाज की गुहार लगाई। जिलाधिकारी ने मामले को गंभीरता से लेते हुए मुख्य चिकित्सा अधिकारी अरुण श्रीवास्तव को तत्काल जांच कर समुचित इलाज और हरसंभव सहायता देने के निर्देश दिए।
*आजकल इंडिया न्यूज और अनीश खान की सराहनीय पहल*
यह पूरा घटनाक्रम इस बात का प्रमाण है कि जब पत्रकारिता ईमानदार होती है, तो वह सिर्फ खबर नहीं दिखाती—बल्कि बदलाव लाती है। आजकल इंडिया न्यूज और उसके पत्रकार अनीश खान ने एक गरीब परिवार की आवाज़ को बुलंद कर प्रशासन तक पहुंचाया।
अगर यह खबर सामने न आती, तो शायद साजिया की पीड़ा आज भी चार दीवारों में सिसकती रह जाती।
*अब उम्मीद ज़िंदा है*
सरकारी स्कूल में कक्षा पांच में पढ़ने वाली साजिया आज भी चलने-फिरने में असहाय है, लेकिन अब उसे भरोसा है कि उसकी आवाज़ सुनी गई है। मां की आंखों में पहली बार उम्मीद दिख रही है कि शायद अब उसकी बेटी को 14 साल के दर्द से राहत मिल सके।
*यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि सच्ची पत्रकारिता की जीत है।*
आजकल इंडिया न्यूज और पत्रकार अनीश खान की यह पहल साबित करती है कि अगर नीयत साफ हो, तो कलम और कैमरा आज भी ज़िंदगियां बदल सकते हैं।




